उत्तर- ऋण लेने से मदद मिलेगी कि नहीं,यह परिस्थिति के खतरों और लाभ या हानि होने की संभावना पर निर्भर करता है। अन्यथा, अधिक जोखिम वाली परिस्थितियों में ऋण कर्जदार के लिए ओर समस्याएँ खड़ी कर सकता है।
उदाहरण- एक किसान खेती के लिए जमींदार से ऊँची ब्याज दर पर ऋण लेता है। उम्मीद थी कि फसल तैयार होने पर वह इस कर्ज को वापस कर देगा। परंतु रोग लगने से फसल नष्ट हो जाती है। वह जमींदार का कर्ज अदा नहीं कर पाता और एक साल के अंदर यह ऋण बड़ी रकम बन जाता हैं। अगले साल वह पुनः ऋण लेता है, इस साल फसल सामान्य रहती है लेकिन इतनी कमाई नहीं होता कि वह अपना ऋण उतार सके। इस तरह, वह ऋणजाल में फंस जाता है और ऋण चुकाने के लिए उसे अपनी जमीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ता है। ऐसी परिस्थिति में ऋण ने उसकी कमाई बढ़ाने के बजाय उसकी स्थिति खराब कर दी।
उत्तर- ऐसा अर्थव्यवस्था में जहाँ मुद्रा का प्रयोग होता है; मुद्रा विनिमय प्रक्रिया में मध्यस्थता का काम करती है और माँगों के दोहरे संयोग को खत्म कर देती है।मुद्रा की सहायता से वस्तुओं व सेवाओं की खरीद में आसानी होती है। इसलिए हर कोई मुद्रा के रूप में भुगतान लेना पंसद करता है। फिर उस धन का उपयोग अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है।उदाहरण- यदि एक जूता निर्माता गेहूँ खरीदना चाहता है। तो वह जूता बेचकर मुद्रा कमाएगा, फिर इस मुद्रा से वह गेहूँ खरीद सकता है।
यदि किसी अर्थव्यवस्था में वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलन में हो तथा मुद्रा का प्रयोग न होता हो तो जूता निर्माता को गेहूं उगाने वाले किसान को खोजना पड़ता, जो न केवल गेहूँ बेचना चाहता हो बल्कि जूता खरीदने में भी रुचि रखता हो। अर्थात् दोनों पक्ष एक दूसरे से चीजें खरीदने व बेचने पर सहमति रखतें हों। इसे आवश्यकताओं का दोहरा संयोग कहते हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली में माँगों का दोहरा संयोग होना आवश्यक है।
उत्तर- (1) अतिरिक्त मुद्रा वाले लोग अपने धन को बैंकों में जमा करते हैं जिस पर उन्हें ब्याज मिलता है।
(2) विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के लिए कर्ज की बहुत मांग रहती है। बैंक उनके पास जमाराशि के प्रमुख भाग को कर्ज देने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह बैंक की आमदनी का जरिया होता है।
इस प्रकार, बैंक दो पक्षों के बीच मध्यस्थता का काम करते हैं। एक जमा कर्ता जिनके पास अतिरिक्त राशि है और दूसरा ऋण प्राप्तकर्ता जिसे इस राशि की जरूरत है।
उत्तर -10 रुपये के नोट पर लिखा होता है-
भारतीय रिजर्व बैंक
‘केंद्रीय सरकार द्वारा प्रत्याभूत’
और
‘मै धारक को
दस रुपये
अदा करने का
वचन देता हूँ।’
इस कथन का अर्थ यह है कि इस नोट का मूल्य ₹10 है और यह पूरे देश में प्रत्येक जगह मान्य है। कोई व्यक्ति देश में कहीं भी इससे ₹10 मूल्य तक की वस्तु/सेवा खरीद सकता है। इस कथन के नीचे भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक केंद्र सरकार की तरफ से करेंसी नोट जारी करता है।
उत्तर- (1) औपचारिक स्तर पर ऋण देने वालों की तुलना में अनौपचारिक खण्ड के ज्यादातर ऋणदाता कहीं ज्यादा ब्याज वसूल करते हैं। इसलिए अनौपचारिक स्तर पर लिया गया ऋण कर्जदाता को कहीं अधिक मँहगा पड़ता है।
(2) ऋण पर ऊँची ब्याजदरों के कारण कर्जदार की आय का अधिकतर हिस्सा ऋण उतारने में खर्च हो जाता है और निजी खर्च के लिए उसके पास बहुत कम आय बचती है।
(3) कई बार ऋण अदायगी की रकम कर्जदार की आय से भी अधिक हो जाती है और व्यक्ति ऋणजाल में फंस सकता है। अतः आवश्यक है कि लोगों को औपचारिक स्रोतों जैसे बैंक, सहकारी समिति आदि से अधिक ऋण मिले।
उत्तर- भारत में गरीब लोग ऋण के लिये अनौपचारिक स्रोतों पर ज्यादा निर्भर हैं। क्योंकि भारत के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक मौजूद नहीं हैं।कई बार बैंक से कर्ज लेना साहूकारों से कर्ज लेने की अपेक्षा ज्यादा मुश्किल है। बैंक से ऋण लेने के लिए संपत्ति और तमाम अन्य कागजातों की जरूरत होती हैं। ऋणाधार नहीं होने के कारण गरीब लोगों को बैंको से कर्ज नहीं मिल पाता है।
दूसरी ओर जमींदार और साहूकार इन लोगों को व्यक्तिगत स्तर पर जानते हैं और कई बार बिना ऋणाधार के ऋण दे देते हैं। लेकिन ये ब्याज की दरें काफी ऊँची रखते हैं। कई बार कागजी कार्रवाई भी पूरी नहीं करते और लोगों की निरक्षरता का लाभ उठाते हुए उनका शोषण करते हैं। गरीबों को इन समस्याओं से निजात दिलाने के उद्देश्य से स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जाता है।
उत्तर- ऋण देते समय बैंक ऋण के लिए कर्जदार से कोई समर्थक ऋणाधार की मांग कर सकता है। समर्थक ऋणाधार ऐसी संपत्ति है जिसका मालिक कर्जदार होता है। जैसे-भूमि, मकान, गाड़ी, पशु आदि। इसका इस्तेमाल ऋणदाता गारंटी के रूप में करता है। ऋणाधार की गैर-मौजूदगी के कारण कुछ गरीब परिवार बैंकों से ऋण नहीं ले पाते हैं।
उत्तर- (1) भारतीय रिजर्व बैंक अन्य बैंकों अन्य बैंकों की गतिविधियों पर नजर रखता हैं बैंक हमेशा अपने पास जमा पूंजी की एक न्यूनतम नकदी अपने पास रखते हैं। आर.बी.आई. नजर रखता है कि बैंक वास्तव में नकद शेष बनाए हुए हैं।
(2) भारतीय रिजर्व बैंक इस बात पर भी नजर रखता है कि बैंक केवल लाभ कमाने वाली इकाइयों व व्यापारियों को ही ऋण न दें। बल्कि छोटे किसानों, छोटे उद्योगों, छोटे कर्जदारों आदि को भी ऋण मुहैया करवाएं।
(3) समय-समय पर बैंकों को आर.बी.आई. को यह जानकारी देनी पड़ती है कि वे कितना और किसे ऋण दे रहे हैं और उसकी ब्याज दरें क्या हैं?
उत्तर- ऋण एक ऐसी सहमति है जहाँ उधारदाता कर्जदार को धन या सेवाएँ प्रदान करता है। बदले में भविष्य में कर्जदार से भुगतान का वादा लेता है।
हमारी रोजमर्रा की जिदंगी में बहुत सी गतिविधियों ऐसी होती हैं, जहाँ हम किसी न किसी रूप में ऋण लेते है।उद्योगपति और व्यापारी उत्पादन के लिए कार्यशील पूँजी की जरूरत को ऋण के जरिये पूरा करते हैं। ऋण उन्हें उत्पादन के कार्यशील खर्चों तथा उत्पादन को समय पर खत्म करने में सहायता करता हैं, जिससे उनकी कमाई बढ़ती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण की मुख्य माँग फसल उगाने के लिए होती हैं फसल उगाने में बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयाँ, उपकरणों की मरम्मत आदि पर काफी खर्च आता है किसान इन जरूरतों को पूरा करने के लिए ऋण लेते हैं। फसल तैयार होने पर किसान ऋण चुकाते हैं।
उत्तर- भारत में बैंक ऋण के औपचारिक स्रोतों की श्रेणी में आते हैं। जबकि साहूकार ऋण की अनौपचारिक श्रेणी में आता हैं। भारतीय रिजर्व बैंकों जैसे औपचारिक स्रोतों की गतिविधियों पर नजर रखता हैं।
जबकि अनौपचारिक क्षेत्र में ऋणदाताओं की गतिविधियों की देख-रेख करने वाली कोई संस्था नहीं है। वे अपनी मर्जी से ऊँची ब्याज दरों पर ऋण दें सकते है। कई बार लिखा-पढ़ी भी पूरी नहीं करते और ऐसी परिस्थिति का फायदा उठाते हुए गरीबों को सताते हैं। अनौपचारिक स्तर पर लिया गया ऋण कर्जदाता को कहीं अधिक महँगा पड़ता है।
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए मानव को फैसला करना चाहिए। वर्तमान स्थिति में औपचारिक स्रोतों से ऋण लेना मानव के लिए श्रेयस्कर होगा।
(क) बैंक छोटे किसानों को ऋण देने से क्यों हिचकिचा सकते हैं?
उत्तर- बैंक से कर्ज लेने के लिए संपत्ति और अन्य दस्तावेजों/कागजातों की जरूरत पड़ती है। छोटे किसानों के पास प्रायः ऋणाधार का अभाव होता है। अतः बैंक उन्हें ऋण देने से हिचकिचा सकते हैं।
उत्तर- छोटे किसान आमतौर पर महाजन, साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार या मित्रों से कर्ज लेते हैं।
उत्तर- ब्याज दर, संपत्ति और कागजात की मांग और भुगतान के तरीके; इन सबको मिलाकर ऋण की शर्ते कहा जाता है। हरेक ऋण समझौते में ब्याज दर पहले ही स्पष्ट कर दी जाती है। इसके अलावा, ऋणदाता कोई समर्थक ऋणाधार की मांग भी कर सकता है।
समर्थक ऋणाधार वह संपत्ति है जिसका मालिक कर्जदार होता है। जैसे- भूमि, मकान, गाड़ी, पशु, बैंकों में पूंजी आदि। वह इसका इस्तेमाल गांरटी के रूप मे करता है जब तक कि ऋण का भुगतान नहीं हो जाता।
यदि कर्जदार ऋण वापस नहीं कर पाता तो ऋणदाता को अपनी रकम वापस पाने के लिए समर्थक ऋणाधार को बेचने का अधिकार होता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कर्ज की मांग मुख्यतः फसल उगाने के लिए होती है। यदि किसी कारणवश फसल बर्बाद हो जाए तो किसान कर्ज की अदायगी समय पर नहीं कर पाता है। अगले वर्ष फसल के लिए उसे पुनः ऋण लेना पड़ता है। इस तरह वह ऋणजाल में फंस सकता है।
उत्तर- छोटे किसानों को ऋण के औपचारिक स्रोतों जैसे बैंक और सहकारी समितियों से सस्ते दर पर ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है। इस कार्य के लिए वे स्वयं सहायता समूह बना सकते हैं जिससे उन्हें ऋण मिलना आसान हो सकता है।
(क) ……………परिवारों की ऋण की अधिकांश जरूरतें अनौपचारिक स्रोतों से पूरी होती हैं।
(ख)…………… ऋण की लागत ऋण का बोझ बढ़ाती है।(ग) ………..केंद्रीय सरकार की ओर से करेंसी नोट जारी करता है।
(घ) बैंक ………… पर देने वाले ब्याज से ऋण पर अधिक ब्याज लेते हैं।
(ङ) …………..वह संपत्ति है जिसकी मालिक कर्जदार होता है जिसे वह ऋण लेने के लिए गांरटी के रूप में इस्तेमाल करता है, जब तक ऋण चुकता नहीं हो जाता।
उत्तर-(क) गरीब
(ख) ऊँची ब्याज दरों पर लिए गए।
(ग) भारतीय रिजर्व बैंक
(घ) जमा
(ङ) समर्थक ऋणाधार
(क) स्वयं सहायता समूह में बचत और ऋण संबंधित अधिकतर निर्णय लिए जाते हैं-
1. बैंक द्वारा,
2. सदस्यों द्वारा,
3. गैर सरकारी संस्था द्वारा।
उत्तर- 2.सदस्यों द्वारा।
1. बैंक
2. सहकारी समिति
3. नियोक्ता
उत्तर- 3. नियोक्ता ।